देहरादून, देश भर में डायबिटीज के बढ़ते मामलों के साथ, डायबिटिक रेटिनोपैथी रोकी जा सकने वाली दृष्टिहीनता का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। शुरुआती निदान और नियमित आंखों की जांच के महत्व पर ज़ोर देते हुए, कंसलटेंट, ओफ्थल्मोलॉजिस्ट, डॉ. बीएम विनोद कुमार ने कहा कि समय पर पहचान और उचित हस्तक्षेप से डायबिटीज वाले व्यक्तियों में स्थायी विज़न लॉस के जोखिम को काफी कम किया जा सकता है।
डायबिटिक रेटिनोपैथी लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर लेवल के कारण होने वाली एक माइक्रोवैस्कुलर जटिलता है, जिसके परिणामस्वरूप रेटिना की रक्त वाहिकाओं को धीरे-धीरे नुकसान होता है। बीमारी की शुरुआत में लक्षण दिखाई नहीं देते, जिससे पहचान में देर हो सकती है और मरीज़ तब सामने आते हैं जब रोग काफी बढ़ चुका होता है। जैसे-जैसे स्थिति बढ़ती है, लक्षणों में धुंधली दृष्टि, फ्लोटर्स, विकृत दृष्टि, या दृष्टि में अचानक गिरावट शामिल हो सकती है।
डॉ. विनोद ने बताया कि जिन मरीजों को लंबे समय से डायबिटीज है, जिनका शुगर स्तर नियंत्रित नहीं रहता, या जो उच्च रक्तचाप एवं अन्य मेटाबॉलिक रोगों से ग्रस्त हैं, उनमें डायबिटिक आंखों से जुड़ी समस्याओं का खतरा अधिक होता है। उन्होंने यह बताया कि डायबिटीज से पीड़ित हर मरीज़ को साल में एक बार आंखों की पूरी जांच करानी चाहिए,चाहे लक्षण हों या नहीं। कंसलटेंट, ओफ्थल्मोलॉजिस्ट डॉ. सोनल बंगवाल ने कहा कि डायबिटिक मरीज़ों में मोतियाबिंद की सर्जरी पहले कराए जाने से दृष्टि के नतीजे बेहतर हो रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि समय रहते की गई शुरुआती मोतियाबिंद सर्जरी न केवल पैनरेटिनल फोटोकोगुलेशन को अधिक प्रभावी ढंग से करने में मदद करती है, बल्कि सर्जरी से पहले डायबिटिक मैकुलर एडिमा की समय पर पहचान, उचित जांच और आवश्यक उपचार को भी संभव बनाती है, जिससे मरीजों में बेहतर दृष्टि परिणाम प्राप्त होते हैं।