देहरादून, कर्मों की गति अति न्यारी है, किया गया कर्म वर्तमान का ही नहीं अपितु पूर्व में भले ही कितने जन्म पूर्व किया गया हो, समय आने पर फल प्रदान करने के लिए, कर्ता के समक्ष प्रकट हो ही जाता है। इतिहास गवाह है! महाराजा दशरथ जी, भीष्म पितामह जी तथा द्रोपदी जी के रूप में। कई-कई जन्मों पूर्व इन्होंने जो कर्म किया उसका फल भुगतना ही पड़ा। अच्छे का अच्छा तथा बुरे का बुरा फल मिलना तय है। जिस प्रकार एक हजार गायों के एक जैसे रंग-रूप-नस्ल होने पर भी बछड़ा अपनी गाय माँ के ही पीछे-पीछे चला करता है, ठीक वैसे ही किया गया कर्म भी संसार भर के अनगिनत लोगों के बीच से अपने कर्ता को पहचान कर उसके पीछे-पीछे तब तक लगातार चलता है, जब तक समयानुकूल उसे फल न प्रदान कर दे। महापुरूष कहते हैं- ‘बोया बूटा आक का, आम कहां से होए।’ जिस प्रकार बिजली बहुत से काम आती है। चाहे तो इससे गर्मी और ठंडक प्राप्त कर इसका सार्थक प्रयोग कर लिया जाए, अगर इसी बिजली की खुली तार को छू लिया जाए तो मनुष्य के जीवन का अंत भी हो सकता है। कबीर साहब तो यहां तक कहते हैं कि पाप का घड़ा जब भर जाता है तो इसका फूटना तय हो जाता है। वे कहते हैं- ‘कबीरा तेरे गुनाहों का जब तक है भण्डार, तब तक गुनाह किए जा चाहे कई हजार।’
यह सदविचार आज ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’ निरंजनपुर देहरादून के आश्रम सभागार में ‘दिव्य गुरू आशुतोष महाराज’ की शिष्या साध्वी विदुषी सुभाषा भारती के मुखारविंद से प्रस्फुटित हुए। अवसर था संस्थान द्वारा प्रस्तुत साप्ताहिक रविवारीय सत्संग-प्रवचनों तथा मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का। इससे पूर्व कार्यक्रम का मंचासीन संगीतज्ञों द्वारा अनेक सुन्दरतम भजनों की प्रस्तुति देते हुए शुभारम्भ किया गया। अनेक भजनों पर संगत करतल ध्वनि के साथ झूम-झूम उठी। भजनों की सारगर्भित मिमांसा करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी अनीता भारती के द्वारा किया गया। साध्वी जी ने बताया कि दिव्य गुरू का पावन सत्संग इंसान को परम त्यागी बनाता है। अपने प्रवचनों में साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी ने आगे बताया कि मनुष्य द्वारा किए गए कर्म उसे बंधन में बंाधने का ही काम किया करते हैं। केवल मात्र ‘भक्ति कर्म’ ही एैसा है जो मानव को स्वतंत्र किया करता है। उन्होंने तीन तरह से किए जाने वाले कर्मों का उल्लेख करते हुए बताया कि एक कर्म होता है प्रारब्ध कर्म, दूसरा होता है संचित कर्म और तीसरा कहा गया है क्रियामान कर्म।