पूर्ण गुरू के दरबार की सेवा शिष्य को ‘पूर्णता’ प्रदान करतीः भारती

देहरादून,  दुर्लभ मनुष्य जीवन में ईश्वरीय उपलब्धि को सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण कार्य सदा से दिव्य गुरु के आधीन रहा है। दिव्य गुरू द्वारा ईश्वरीय राह में एक भक्त को नियम पूर्वक साधना-सुमिरन के साथ-साथ सत्संग और गुरू के दर्शनों सहित सेवा को भी अत्यंत आवश्यक बताया गया है। सेवा जहां एक ओर शिष्य के भीतर से अहंकार का नाश करती है वहीं दूसरी ओर ईश्वर की तरफ आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है। पूर्ण गुरू के पावन दरबार की निष्काम सेवा ईश्वर की प्राप्ति कराकर एक साधक को ‘पूर्णता’ प्रदान किया करती है। तभी कहा भी गया-‘‘करत सेव होत निष्कामी, ताको प्रापत होत हैं स्वामी’’
इन सदविचारों को आज ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’ की निरंजनपुर स्थित शाखा के आश्रम सभागार में ‘सदगुरूदेव श्री आशुतोष महाराज जी’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी सुभाषा भारती के द्वारा असंख्य भक्त-श्रद्धालुगणों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अवसर था, रविवारीय साप्ताहिक सत्संग-प्रवचनों तथा मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का। भजनों की अविरल धारा के दिव्य प्रवाह में संगत करतल ध्वनि के साथ गोते लगाती रही। भजनों की विस्तृत व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी जाह्नवी भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि जीवन में जब गुरु की कृपा बरसती है तो इसे नापा नहीं जा सकता है। यही कृपा मनुष्य को सीधे ईश्वर तक पहुंचा देती है। ईश्वर एक समुद्र के समान हैं और गुरू बादलों के सदृश हुआ करते हैं। समुद्र से सीधे जल लेकर अपनी प्यास नहीं बुझाई जा सकती, भले ही समुद्र में अथाह जलराशि हुआ करती है, लेकिन उसका जल ख़ारा होने के कारण पीने योग्य नहीं होता। गुरू रूपी बादल उसी जल को अपने भीतर वाष्प के रूप में संजोकर जब बरसते हैं तब वह जल सर्वथा पीने योग्य हो जाता है। यह है गुरू कृपा, जो कि बरसने पर यह नहीं देखती कि वह कहां बरस रही है। खेतों में, खलिहानों में, रेगिस्तान में या फिर उसी खारे समुद्र में ही। जल से भरे हुए बादलों की तो यह विवशता है कि उन्हें तो बरसना ही होता है। यही है गुरू की ‘अहैतुकी कृपा’।
अपने सत्संग विचारों को गति प्रदान करते हुए साध्वी सुभाषा भारती ने आगे कहा कि इतिहास साक्षी है कि पूर्ण गुरू के दरबार में स्वयं देवी-देवता भी सेवा करने के लिए लालायित रहा करते हैं। तीन प्रकार से गुरू की सेवा होती है। तन-मन-धन के द्वारा जब शिष्य सेवा करता है तो तन की सेवा से उसका तन स्वच्छ तो होता ही है साथ ही अनेक प्रकार के रोगों-कष्टों का भी निदान यह सेवा किया करती है। मन की सेवा गुरू का चिंतन-भजन और साधना-सुमिरन तथा सत्संग के रूप में होती है। गुरू के लक्ष्य में प्रतिबद्धता की इस सेवा से मन के विकार और समस्त दोषों से भी मुक्ति प्राप्त होती है। धन की सेवा से धन पवित्र हो जाता है। जब जीवात्मा के पास आवश्यकता से अधिक धन आ जाए तो उसे दान के रूप में प्रयुक्त किए जाने पर जीव बुरी आदतों से बचा रह सकता है।

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