दिव्य निर्माणशाला’ होता है पूर्ण गुरु का दरबारः भारती

देहरादून, प्रत्येक सप्ताह की भांति आज भी दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की देहरादून शाखा द्वारा अपने निरंजनपुर आश्रम सभागार में साप्ताहिक रविवारीय सत्संग-प्रवचनों तथा सुमधुर भजन-संकÊतन के कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। प्रस्तुत भजनों की श्रंखला से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मंच संचालन करते हुए भजनों की व्याख्या साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी के द्वारा की गई। उन्होंने बताया कि जब इन्सान महान तथा उत्कृष्ट लोगों की सोहबत में उठता-बैठता है तब धीरे-धीरे वह स्वतः ही महान बनने लगता है। जिस प्रकार पुष्प वाटिका में नित्य विहार करने वाला वहां स्थित सुगन्धित पुष्पों की सुगन्धि ही नहीं पाता अपितु वहां के वातावरण में अपना अधिकतम समय व्यतीत किए जाने पर उसका स्वयं का जीवन ही सुगन्ध से भर जाता है एैसे ही सत्संग की दिव्य महिमा भी होती है। महापुरूष कहा करते है कि संगत की रंगत अपना प्रभाव अवश्य दिखाती है। संगत चाहे अच्छी हो या फिर बुरी इसका गहरा असर मानव के मन पर अवश्य पड़ता है। इसीलिए महापुरूषों ने सत्संग का प्रावधान रचा ताकि मनुष्य सत्संग में आकर सदा सकारात्मक विचारों तथा ईश्वरीय महान प्ररेणाओं को प्राप्त कर अपने मानवीय जीवन का कल्याण कर सके। ईश्वर के रंग में रंग जाए। साध्वी जी ने कहा कि पूर्ण गुरू की कृपा को प्राप्त कर ही जीव का भाग्य उदित होने लगता है।
मनुष्य के सौभाग्य की यही निशानी है कि उसे महापुरूषों का संग प्राप्त लगे तथा परम गुरू के पावन ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर वह अपने भीतर स्थित ईश्वर का दर्शन तथा प्राप्ति दोनों कर पाए। कार्यक्रम में सदगुरू आशुतोष महाराज की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी अनीता भारती ने अपने प्रवचनों में बताया कि पूर्ण गुरू का दरबार जीव के महान निर्माण करने की एक दिव्य निर्माणशाला हुआ करता है। उन्होंने संत सुन्दरदास जी के जीवन वृतांत को भक्तजनों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए उनकी अपने गुरू के प्रति निष्ठा, विश्वास तथा प्रेम को रेखांकित किया, उन्होंने श्री आनन्दपुर साहिब की दिव्य धटना को भी सुनाया और बताया कि सदगुरू की महिमा इतनी महान है कि उनके सम्पर्क में आने वाला जनसमाज़ अपने भीतर ईश्वरीय गुणों की स्थापना सहज ही कर लिया करता है। गुरू अगर कृपालु हों तो शिष्य के अन्र्तमन के ज्ञान की कोई सीमा ही नहीं रहती है।
भाव की प्रगाढ़ता से जो शिष्य गुरू दरबार की सेवा किया करता है तब समूची कायनात की दिव्य शक्तियाँ उस पर कृपा करने के लिए तत्पर हो जाती हैं। पूर्ण गुरू का पावन दरबार सृष्टि में ‘सर्वोच्च’ स्थान रखता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *