देहरादून, ऐसे युग में जहां शिक्षा क्षेत्र एक आकर्षक उद्योग बन चुका है, फिर भी आज काफी कम स्कूल ऐसे है जो अपनें सकारात्मक दृष्टिकोन के माध्यम से उनके विद्यार्थीयों का जीवन और भविष्य सुधारनें में जुटें है। एक ओर अमीरों के लिए शिक्षा के कई अवसर है तो दुसरी और मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग के लिए यह स्थिती कठीन होती है। इन समुदायों में आनेंवाली जनता का भविष्य सुधारनें के लिए शिक्षा ही एकमात्र जरिया होता है।
आर्थिक दृष्टी से स्थीर वातावरण में आंतरराष्ट्रीय संस्थानों सहीत शिक्षा के कई पर्याय उपलब्ध होते है। हालांकी, यह दृष्य संपूर्ण भारत को प्रतिबिंबित नहीं करता। भारत में काफी मात्रा में गरीब और मध्यमवर्ग के लोग है जो पूर्ण रुप से सरकारी स्कूल और किफायती निजी स्कूलों पर निर्भर होते है। इन स्कूलों का निर्माण विद्यार्थीयों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लानें हेतु किए जानें के बावजूद मध्यम वर्ग और निम्न आय के ग्रुप के साथ यह स्कूल कई चुनौतीयों का सामना करती है। स्कूलों के मालिकों को वित्तीय समस्याओं जैसी चुनौतीयों के साथ , कर्मचारीयों की कमी, लिंग पर आधारीत शिक्षा के प्रती अनास्था, शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थीयों का स्कूल बीच में छोडकर लेबर मार्केट में जाना, तंत्रज्ञान की दृष्टी से समस्याएं और कम बुनियादी सुविधाओं जैसी चुनौतीयों का सामना करना पडता है। कोविड -19 महामारी से इन चुनौतीयों में भी बढ़ोत्तरी हुई है।
ऐसी स्कूलों के लिए सरकार ने कई कदम उठाएं है फिर भी उनपर अमल काफी धीमी गती से हो रहा है, जिनके चलते स्कूलों को अन्य पर्यायों को ढूंढना पड़ता है।