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रसोई बर्तनों का भारत में इतिहास

प्रागैतिहासिक काल (पाषाण काल) मानव इतिहास का वह आधारभूत कालखंड है जब मानव ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना और अपनी बुनियादी ज़रूरतों को आकार देना सीखा। इस लंबी यात्रा में भोजन पकाने की कला, बर्तनों का निर्माण और रसोई की संरचना ने मानव संस्कृति के विकास में केंद्रीय भूमिका निभाई। भारतीय उपमहाद्वीप में पुरापाषाण (Palaeolithic),मध्यपाषाण (Mesolithic) और नवपाषाण (Neolithic) कालों के पुरातात्विक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि प्रारंभिक भारतीय मानव भोजन संग्रहकर्ता से लेकर कुशल कृषक और खाद्य-उत्पादक बनने की राह पर कैसे अग्रसर हुआ।

प्रागैतिहासिक संदर्भ और खाद्य तकनीक भारत में प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के अवशेष भीमबेटका (मध्य प्रदेश), आदमगढ़, बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश), संगनकल्लू और बुर्जहोम (कश्मीर) जैसे स्थलों से प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। पुरापाषाण काल में मानव मुख्य रूप सेमांसाहारी और कंदमूल-आधारित कच्चा भोजन करता था। आग की खोज (लगभग निचले या मध्य पुरापाषाण काल में) ने भोजन पकाने की दिशा को बदल दिया। मध्यपाषाण काल तक आते-आते जलवायु परिवर्तन हुआ, जिससे छोटे जीवों, मछली और जंगली अनाजों की खपत बढ़ी। नवपाषाण काल में कृषि और पशुपालन के आरंभ ने पाक-कला (culinary culture) में एक क्रांतिकारी मोड़ दिया। अब मानव ने अनाज को उबालकर, भूनकर और पकाकर खाना शुरू किया, जिसके लिए विशिष्ट बर्तनों और निश्चित स्थानों की आवश्यकता पड़ी।

रसोई बर्तन: पत्थर, लकड़ी और मिट्टी के शिल्प पाषाण कालीन रसोई में बर्तन मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों से गढ़े जाते थे।

·         पत्थर के उपकरण और बर्तन: प्रारंभिक काल में भारी पत्थरों को तराश कर मूसल, ओखली (querns and grinders) और चक्की बनाई जाती थी, जिनका उपयोग अनाज पीसने, मसाले कूटने और कंदमूलों को कुचलने के लिए किया जाता था। दक्षिण भारत के नवपाषाणिक स्थलों जैसे पिक्लीहाळ और उतनूर में ऐसे कई पाषाण उपकरण मिले हैं।

·         लकड़ी और बांस के बर्तन: यद्यपि लकड़ी के बर्तन जैविक होने के कारण समय के साथ नष्ट हो गए, लेकिन एथनोग्राफिक साक्ष्यों और औजारों के निशान बताते हैं कि लकड़ी के कटोरे, चम्मच और बांस की नलियों का उपयोग भोजन के भंडारण और पकाने में बड़े पैमाने पर होता था।

·         मृदभांड (मिट्टी के बर्तन): नवपाषाण काल की सबसे बड़ी विशेषता हाथ से बने और बाद में चाक पर निर्मित मृदभांड (pottery) हैं। मेहरगढ़ और कश्मीर के बुर्जहोम में शुरुआती हस्तनिर्मित धूसर (grey) और लाल मृदभांड मिले हैं। इन बर्तनों का उपयोग मुख्य रूप से दलिया पकाने, पानी उबालने और खाद्य सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। कुछ बर्तनों की तली पर सूत या चटाई की छाप मिलती है, जो उनकी निर्माण तकनीक को दर्शाती है।

पाषाण कालीन रसोईघर की संरचना आधुनिक अर्थों में कोई अलग या पक्का रसोईघर इस काल में मौजूद नहीं था, किंतु आवासों की बनावट में रसोई का स्थान निश्चित था।

·         चूल्हे और अग्नि-कुंड: अधिकांश पुरातात्विक स्थलों पर झोपड़ियों के भीतर या ठीक बाहर चूल्हों (ovens/hearths) के अवशेष मिले हैं। बुर्जहोम और गुफकराल (कश्मीर) में गड्ढे वाले घरों (pit-dwellings) के भीतर मिट्टी और पत्थरों से घिरे चूल्हे मिले हैं, जो ठंड से बचने और भोजन पकाने दोनों के काम आते थे।

·         खुले आसमान के नीचे रसोई: मध्यपाषाण काल के आश्रय स्थलों (Rock shelters) जैसे भीमबेटका में चट्टानों के नीचे राख की परतें, जली हुई हड्डियाँ और चारकोल के टुकड़े यह साबित करते हैं कि चट्टानी आश्रयों का एक हिस्सा भोजन पकाने के लिए नियत था,जिसे हम आदिम रसोईघर कह सकते हैं।

सामूहिक रसोई की अवधारणा पाषाण कालीन समाजों में व्यक्तिगत परिवार की अवधारणा के साथ-साथ कबीलाई या सामूहिक जीवन की प्रबलता थी। नवपाषाणिक बस्तियों और खासकर दक्षिण भारत के ऐशमंड्स‘ (Ashmoundsराख के टीले) इस बात का संकेत देते हैं कि कई परिवार मिलकर बड़े अनुष्ठानों या दैनिक आवश्यकताओं के तहत सामूहिक भोज का आयोजन करते थे। भोजन का साझा भंडारण और सामुदायिक चूल्हों का उपयोग इस काल की सामाजिक एकजुटता को दर्शाता है, जहाँ भोजन केवल पोषण नहीं बल्कि कबीलाई भाईचारे का माध्यम था।

वैशिष्ठ्य और निष्कर्ष भारतीय पाषाण काल की रसोई और बर्तन इस बात के गवाह हैं कि प्रारंभिक मानव ने अपनी बुद्धि और पर्यावरण के दोहन से किस प्रकार जीवन को सुगम बनाया। पत्थर और मिट्टी के इस संलयन ने आगे चलकर सिंधु घाटी सभ्यता जैसी उन्नत शहरी संस्कृतियों की नींव रखी।

संदर्भ ग्रंथ:

1.      अग्रवाल, डी.पी. (१९८२), द आर्कियोलॉजी ऑफ़इंडिया, कर्डन प्रेस।

2.      संलिया, एच.डी. (१९७४), प्रीएंड प्रोटो-हिस्टॉरिक इंडिया एंड पाकिस्तान, डेक्कन कॉलेज, पुणे।

3.      झा, डी.एन. (२०००), द मिथ ऑफ़ द होली काऊ, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

4.      चक्रवर्ती, दिलिप के. (१९९९), इंडियाज़ एनशिएंटपास्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

आभार – कृबु

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