मसूरी। उत्तराखण्ड फिल्म उद्योग पर छाये संकट के बादल से उबारने के लिए उत्तराखंड फिल्म टेलीविजन एंव रेडियो एसोसिएशन उफतारा ने सरकार से मांग की है कि शीघ्र फिल्म बोर्ड का गठन किया जाय, फिल्म पुरस्कार जारी किए जाय, व क्षेत्रीय फिल्म विकास परिषद को तय राशि में से कटौटी बंद कर शोषण पर रोक लगायी जाय।
लाइब्रेरी स्थित एक होटल के सभागार में आयोजित पत्रकार वार्ता मे उफतारा के नव निर्वाचित अध्यक्ष प्रदीप भंडारी ने कहा कि उत्तराखंड में क्षेत्र भाषा आधारित फिल्म उद्योग सरकार की गलत नीतियों के कारण बंदी के कगार पर पहुंच चुका है विगत दस सालों से फिल्म बोर्ड का गठन नहीं हो पाया है, सरकार ने हर वर्ष 50 लाख की राशि फिल्म पुरस्कार के लिए निर्धारित की थी उसका लाभ यहां के फिल्म निर्माताओं, कलाकारों को नहीं दिया जा रहा है, क्षेत्रीय फिल्म विकास परिषद क्षेत्रीय फिल्म निर्माताओं को तय अनुदान में 25 प्रतिशत से अधिक कटौती कर शोषण कर रही है जिससे फिल्म निर्माताओं को भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि फिल्म उद्योग रोजगार का सबसे बड़ा साधन है वहीं उत्तराखंड की लोक संस्कृति बोली भाषा बचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। 2007 से फिल्म बोर्ड गठन की मांग की जा रही है उसके बाद हरीश रावत की सरकार में वर्ष 2015 में बोर्ड बना व उनकी सरकार जाने के बाद फिर से बंद हो गया। अगर बोर्ड बना होता तो उत्तराखंड फिल्म उद्योग को बढावा मिलता उनकी समस्याओं का समाधान होता। आज हाल यह है कि उत्तराखंडी फिल्मों को सिनेमा हाल तक नहीं दिया जाता जो अपने ही प्रदेश में अपमान होता है, शूटिंग में कोई सुरक्षा के साधन नहीं मिलते, ऐसे में उत्तराखंड के फिल्म उद्योग पर बंदी का खतरा मंडरा रहा है। इस अवसर पर उफतारा के महासचिव कान्ता प्रसाद ने कहा कि यद्यपि वर्तमान सरकार ने एक अच्छी फिल्म नीति बनायी है मगर उस नीति का व्यवहारिक लाभ क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री को नहीं मिल रहा है जिससे आंचलिक भाषायी सिनेमा बढ़ने के बजाय घटता नज़र आ रहा है जिससे उफतारा चिन्तित है। उन्होंने कहा कि बाहरी फिल्मों को सरकार तमाम तरह की सुविधा दे रही है लेकिन स्थानीय कलाकारों को कोई सुविधा नही दी जाती। यह उत्तराखंड फिल्म उद्योग के कारण ही आज शादियों में पंजाबी की जगह पहाड़ी गाने बजाये जाते हैं। ऐसे में कलाकारो को प्रोत्साहित करने, की जरूरत है व कलाकारों को मानदेय बढाया जाय। एसोसिएशन लगातार उत्तराखंड के कलाकारों के हितो की सुरक्षा के लिए कार्य कर रही है। उफतारा ने ही ढोल को राज्य वाद्ययंत्र बनाये जाने की मांग की थी जिसकी घोषणा उफतारा के कार्यक्रम में की गयी थी। उफतारा के उपाध्यक्ष डा. अमरदेव गोदियाल ने कहा कि लोक कलाकारों की दशा सुधारने की भी बड़ी आवश्यकता है। आज लोकनृत्क कलाकारों को एक कार्यक्रम का 800 रूपए मानदेय दिया जाता है जबकि इस मंहगाई के जमाने में उनका मानदेय 2000 होना चाहिए। तथा लोक दल कलाकारों का समय पर भुगतान भी नहीं होता है। यही हाल पेंशन का भी है 95 साल तक के अनेक बुजर्ग लोक कलाकारों की पेंशन आज तक नहीं लगी है। प्रेसवार्ता में उफतारा अध्यक्ष प्रदीप भण्डारी, महासचिव कान्ता प्रसाद, प्रचार सचिव नागेन्द्र प्रसाद, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा. अमरदेव गोदियाल, कोषाध्यक्ष प्रमोद बेलवाल, सहसचिव नन्दन सिंह कण्डारी, सलाहकार संयोजक जस पंवार जस्सी, कमलेश भण्डारी आदि मौजूद रहे।